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साक्ष्यों में खामियों के चलते मनोज उर्फ मुन्ना बरी, उच्चतम न्यायालय ने दोषसिद्धि रद्द की

Editor - Omprakash Najwani - Mera Samaj Merabharat
उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि किसी आपराधिक मामले में आरोपी को दोषी ठहराने के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य तभी उपयोग में लाए जा सकते हैं, जब वे केवल उसके दोषी होने की ओर ही संकेत करें। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने वर्ष 2004 के हत्या के मामले में आरोपी मनोज उर्फ मुन्ना की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए इस कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि केवल अंतिम बार एक साथ देखे जाने का सिद्धांत उन मामलों में दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिए अपर्याप्त है, जो पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित हों।पीठ की ओर से न्यायमूर्ति मिश्रा ने फैसला लिखते हुए कहा, ‘‘आपराधिक न्यायशास्त्र में यह एक सुव्यवस्थित सिद्धांत है कि किसी आरोपी को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर तभी दोषी ठहराया जा सकता है, जब वे उसकी निर्दोषता से पूरी तरह असंगत हों और केवल उसके दोषी होने की ओर ही संकेत करें।’’ फैसले में कहा गया कि प्रत्यक्ष साक्ष्य के अभाव वाले मामलों में परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिए, जो केवल अपराध की परिकल्पना की ओर ले जाएं और आरोपी की निर्दोषता की हर दूसरी संभावना को खारिज कर दें। पीठ ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की शृंखला में महत्वपूर्ण कमियां पाए जाने के बाद मनोज को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। मामला जून 2004 का है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मनोज ने वाहन चुराने और उसे बेचने के आरोप में पांच सह-आरोपियों के साथ मिलकर युवराज सिंह पटले नामक ट्रैक्टर चालक की हत्या की थी। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 2011 में उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी थी।
19-December-2025 || Mera Samaj Merabharat
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