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फर्जी सिम-नेटवर्क और जेल-नेटवर्क पर नकेल: सीआईके व जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सैकड़ों सिम कार्ड व मोबाइल जब्त कर नौ संदिग्ध हिरासत में लिए

Editor - Omprakash Najwani - Aagaj Ki Aawaj
संदर्भ: जम्मू-कश्मीर। आतंकवाद के खिलाफ चल रही कार्रवाई अब पारंपरिक मुठभेड़ों और घेराबंदी से आगे बढ़ चुकी है। हाल के समन्वित अभियानों में जम्मू-कश्मीर पुलिस और काउंटर इंटेलिजेंस कश्मीर (सीआईके) ने श्रीनगर, बारामूला, कुलगाम, पुलवामा, शोपियां, अनंतनाग और कुपवाड़ा जिलों में दर्जनों ठिकानों पर छापेमारी की और सैकड़ों सिम कार्ड तथा मोबाइल उपकरण जब्त किए, जिनका इस्तेमाल पाकिस्तानी हैंडलरों द्वारा सुरक्षित संचार चैनल बनाए रखने के लिए किया जा रहा था।इन कार्रवाइयों के दौरान सीआईके की टीम ने नौ संदिग्धों को हिरासत में लिया है, जिनमें एक महिला भी शामिल है। इसी के समानांतर जम्मू क्षेत्र के रामबन, डोडा, किश्तवाड़, राजौरी और कठुआ जिलों में भी तलाशी अभियान चलाए गए और उन परिवारों के घरों की जांच की गई जिनके सदस्य पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में रह रहे हैं या आतंकियों के संपर्क में होने की आशंका पाई गई। कठुआ जिले में दो विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) को आतंकियों से संबंध होने के आरोप में बर्खास्त किया गया है।कश्मीर की जेलों में भी सख्त निगरानी तेज कर दी गई है। अनंतनाग, कुपवाड़ा और बारामूला की जेलों में छापेमारियों के दौरान मोबाइल फोन, सिम कार्ड और कागज़ी नोट्स बरामद किए गए हैं। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने संकेत दिया है कि कुछ कैदी बाहर के ऑपरेटिव्स से एन्क्रिप्टेड ऐप्स के ज़रिए संपर्क में थे; इसलिए यह कार्रवाई निवारक प्रकृति की बताई जा रही है ताकि राष्ट्र-विरोधी नेटवर्क दोबारा संगठित न हो सकें।हालाँकि कुछ मानवाधिकार कार्यकर्त्ताओं ने चिंता जताई है कि इस तरह की व्यापक छानबीन में निर्दोष परिवार भी संदेह के घेरे में आ सकते हैं, सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस नई रणनीति का समर्थन किया है। पूर्व उत्तरी सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बीएस जसवाल का कहना है कि “कश्मीर में आतंकवाद अब विकेंद्रीकृत और डिजिटल रूप ले चुका है। इसलिए इसे केवल बंदूक से नहीं, बल्कि तकनीक और इंटेलिजेंस से जवाब देने की आवश्यकता है।”देखा जाये तो कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ जंग अब बंदूक की नोक पर नहीं, बल्कि डेटा, डिवाइस और निवारक रणनीतियों के सहारे लड़ी जा रही है। फर्जी सिम कार्ड नेटवर्क, स्थानीय सहयोगियों द्वारा दी जा रही लॉजिस्टिक मदद और जेलों के भीतर से चल रही गुप्त गतिविधियाँ आतंकवाद को जिंदा रखने वाली कड़ियाँ रही हैं। पुलिस की यह “नेटवर्क डिस्मेंटलिंग” नीति इस बात का संकेत है कि अब फोकस केवल आतंकियों पर नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र पर है जो उन्हें सक्रिय रखता है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह अभियान जनसमर्थन और विधिक पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ता रहा, तो कश्मीर में स्थायी शांति सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।

10-November-2025 || Aagaj Ki Aawaj
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