बिहार में भाजपा का ग्राफ लगातार ऊपर, सत्ता की कमान अब भी दूर फर्श से अर्श तक पहुंची पार्टी अब आत्मनिर्भर बनने की तैयारी में
पटना। अगर राज्य में भारतीय जनता पार्टी की उपलब्धि को देखा जाए, तो स्पष्ट है कि साल 2015 के बाद से भाजपा का बिहार में ग्राफ लगातार ऊपर उठा है। 2015 में पार्टी के खाते में 53 सीटें आईं, जबकि 2020 में यह संख्या बढ़कर 74 तक पहुंच गई। बिहार भाजपा का इतिहास गौरवशाली रहा है। राज्य में पार्टी की यात्रा 21 सीटों से शुरू होकर आज भाजपा को राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित कर चुकी है।
बिहार की राजनीति का एक कड़वा सच यह है कि कोई भी दल अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा सका है। जो दलों ने ऐसा किया, उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। बिहार की 243 विधानसभा सीटों में भाजपा का ग्राफ 2015 को छोड़कर लगातार बढ़ता रहा है।
भाजपा लंबे समय से बिहार की सत्ता में भागीदार रही है, लेकिन अब तक सरकार की कमान उसके हाथों में नहीं आई है। इससे स्पष्ट है कि बिहार में भाजपा आत्मनिर्भर बनने के लक्ष्य से अभी कुछ दूरी पर है।
भाजपा का औपचारिक गठन 6 अप्रैल 1980 को हुआ था। पार्टी के पहले प्रदेश अध्यक्ष जगदंबी यादव थे। बिहार में भाजपा की नींव भारतीय जनसंघ से पड़ी, जिसने 1962 के तीसरे विधानसभा चुनाव में तीन सीटें जीती थीं। 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनने के बाद हुए चुनावों में 324 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 21 सीटें जीतीं।
1985 में पार्टी को पांच सीटों का नुकसान हुआ। 1990 में भाजपा ने 40 सीटें जीतीं, जबकि 1995 में उसे 41 सीटों पर सफलता मिली। 2005 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन के कारण पार्टी को दो सीटों का लाभ हुआ और 102 उम्मीदवारों में से 55 सीटों पर जीत दर्ज की। 2010 में भाजपा ने 91 सीटें जीतीं। वर्तमान में बिहार विधानसभा में भाजपा के 77 विधायक हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी ने बिहार में फर्श से अर्श तक का सफर तय किया है, लेकिन अभी भी उसे आत्मनिर्भर बनने के लिए और प्रयास करने होंगे। कैलाशपति मिश्र सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने अपने परिश्रम से पार्टी को इस मुकाम तक पहुंचाया है। आज भाजपा बिहार की नंबर वन पार्टी बन चुकी है और अब उसका लक्ष्य सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेना है।
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